भारत का स्वदेशी लाइट टैंक ‘जोरावर’ फिलहाल विकास के अंतिम चरणों में है, लेकिन सेना की नई मांग के कारण इसकी तैनाती में कुछ देरी हो सकती है। भारतीय सेना चाहती है कि यह टैंक दुश्मन के बड़े हथियारों और तोपखाने के हमलों का भी बेहतर तरीके से सामना कर सके। इसके लिए टैंक में अतिरिक्त सुरक्षा कवच लगाने का सुझाव दिया गया है।
देरी क्यों हो सकती है?
टैंक की सुरक्षा बढ़ाने के लिए उसमें ज्यादा मजबूत आर्मर लगाया जाएगा। लेकिन इससे उसका वजन बढ़ सकता है। समस्या यह है कि लद्दाख जैसे ऊंचे और कठिन इलाकों में तेजी से संचालन के लिए टैंक का वजन 25 टन से कम रखना जरूरी है। इसी वजह से वैज्ञानिक और इंजीनियर ऐसी तकनीक खोज रहे हैं जिससे सुरक्षा भी बढ़े और वजन भी ज्यादा न बढ़े।
क्या है सेना की नई मांग?
सेना चाहती है कि टैंक केवल मशीन गन या बारूदी सुरंगों से ही नहीं, बल्कि 25-30 मिमी तोपों और भारी आर्टिलरी हमलों के खिलाफ भी बेहतर सुरक्षा प्रदान करे।
क्यों खास है जोरावर टैंक?
Defence Research and Development Organisation और Larsen & Toubro द्वारा विकसित यह टैंक विशेष रूप से चीन सीमा के ऊंचाई वाले इलाकों के लिए तैयार किया गया है।
इसकी प्रमुख खूबियां:
105 मिमी ऑटोलोडिंग गन
मशीन गन और रिमोट वेपन स्टेशन
Nag Mark-2 मिसाइल क्षमता
760 हॉर्सपावर इंजन
पहाड़ी इलाकों में लगभग 70 किमी/घंटा की गति
एयरलिफ्ट करना क्यों जरूरी है?
25 टन से कम वजन होने पर इस टैंक को मध्यम आकार के सैन्य मालवाहक विमानों से भी जल्दी सीमा तक पहुंचाया जा सकता है। लेकिन वजन बढ़ने पर बड़े विमानों की जरूरत पड़ेगी, जिससे तैनाती की गति प्रभावित हो सकती है।
सेना की योजना क्या है?
भारतीय सेना भविष्य में ऐसे 354 टैंक शामिल करने की योजना बना रही है। शुरुआती 59 टैंकों का निर्माण Larsen & Toubro के गुजरात स्थित हजीरा प्लांट में किया जा रहा है।







Comments