टीवीके सरकार ने मंदिर निधि से चलने वाली ₹246 करोड़ की 46 परियोजनाएं रद्द कीं, कहा- मंदिरों को दिवालिया होने से बचाना जरूरी
तमिलनाडु की टीवीके सरकार ने डीएमके शासनकाल में स्वीकृत 46 परियोजनाओं को निरस्त कर दिया है। सरकार का कहना है कि मंदिरों की आय का इस्तेमाल गैर-धार्मिक ढांचागत कार्यों में नहीं होना चाहिए।
By Payal SinghPublished 22 Jun 2026, 12:15 PMUpdated 27 Jul 2026, 09:18 PM3 min read20 views
तमिलनाडु सरकार ने ₹246 करोड़ की 46 परियोजनाएं रद्द कीं।
ये परियोजनाएं डीएमके सरकार के दौरान मंजूर हुई थीं।
प्रस्ताव था कि इनका खर्च मंदिर निधि से किया जाएगा।
टीवीके सरकार ने कहा कि मंदिरों की आय का इस्तेमाल गैर-धार्मिक कामों में नहीं होना चाहिए।
सरकार के मुताबिक, इस फैसले से मंदिरों पर वित्तीय बोझ कम होगा।
यह कदम हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग से जुड़े मंदिरों की वित्तीय सुरक्षा के लिए उठाया गया है।
फैसले के बाद राज्य में धार्मिक निधि के उपयोग को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
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Quick Summary
तमिलनाडु में मंदिरों की आय और उसके उपयोग को लेकर राजनीति हमेशा संवेदनशील मुद्दा रही है। टीवीके सरकार का यह फैसला केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक और वैचारिक संदेश भी है। सरकार यह रेखांकित करना चाहती है कि भक्तों द्वारा दिए गए दान और मंदिरों की आय को केवल धार्मिक और मंदिर-संबंधी जरूरतों तक सीमित रखा जाए। दूसरी ओर, इस कदम से डीएमके सरकार की उस नीति पर सवाल उठे हैं, जिसके तहत मंदिर निधि का उपयोग व्यापक सार्वजनिक परियोजनाओं में करने की योजना बनाई गई थी। आने वाले समय में यह मुद्दा धर्म, राज्य और सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल पर बड़ी बहस का केंद्र बन सकता है।
तमिलनाडु की सत्तारूढ़ टीवीके सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए पिछली डीएमके सरकार के कार्यकाल में मंजूर की गई ₹246 करोड़ की 46 परियोजनाओं को रद्द कर दिया है। इन परियोजनाओं के लिए मंदिर निधि के इस्तेमाल का प्रस्ताव था। सरकार का कहना है कि मंदिरों की आय और भक्तों के दान का उपयोग केवल मंदिरों, धार्मिक अनुष्ठानों, रखरखाव और संबंधित धार्मिक उद्देश्यों के लिए ही किया जाना चाहिए। सरकार के इस फैसले के बाद राज्य में मंदिर निधि के इस्तेमाल, धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता और सरकारी प्राथमिकताओं को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
किन परियोजनाओं को रद्द किया गया?
अधिकारियों के अनुसार, रद्द की गई 46 परियोजनाएं हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग (HR&CE) के अंतर्गत आने वाले मंदिरों से जुड़ी वित्तीय योजनाओं का हिस्सा थीं। इन योजनाओं में मंदिरों से मिलने वाले राजस्व को विभिन्न अवसंरचना और विकास कार्यों में लगाने की बात थी। हालांकि, नई सरकार ने इस मॉडल पर आपत्ति जताई और कहा कि धार्मिक संस्थानों की आय को उन उद्देश्यों में नहीं लगाया जाना चाहिए जो सीधे मंदिरों या धार्मिक गतिविधियों से जुड़े नहीं हैं।
टीवीके सरकार का क्या तर्क है?
मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली टीवीके सरकार ने स्पष्ट किया है कि मंदिर निधि को “सुरक्षित” रखना जरूरी है। सरकार का कहना है कि अगर मंदिरों की आय को गैर-धार्मिक परियोजनाओं में खर्च किया जाएगा, तो इससे मंदिरों की वित्तीय स्थिति कमजोर हो सकती है और भविष्य में वे आर्थिक संकट या दिवालियापन जैसी स्थिति का सामना कर सकते हैं। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इस फैसले का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि मंदिरों के संसाधनों का उपयोग मंदिर प्रशासन, पूजा-पाठ, जीर्णोद्धार, धार्मिक सेवाओं और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए ही हो।
‘दान की पवित्रता’ का तर्क
सरकार इस निर्णय को केवल वित्तीय नहीं, बल्कि धार्मिक और नैतिक दृष्टि से भी सही ठहरा रही है। उसका कहना है कि मंदिरों को मिलने वाला धन श्रद्धालुओं द्वारा धार्मिक आस्था के साथ दिया जाता है। ऐसे में उसका इस्तेमाल उन्हीं उद्देश्यों के लिए होना चाहिए, जिनके लिए वह दान दिया गया है। इसी कारण इस कदम को सरकार “मंदिर निधि की सुरक्षा” और “भक्तों के दान की पवित्रता बनाए रखने” की दिशा में एक सुधारात्मक निर्णय बता रही है।
क्या सभी परियोजनाएं शुरू हो चुकी थीं?
सरकारी सूत्रों का कहना है कि रद्द की गई कई परियोजनाएं अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हुई थीं। कुछ प्रस्ताव शुरुआती स्तर पर थे, जबकि कुछ में कानूनी और वित्तीय स्पष्टता को लेकर सवाल थे। ऐसे में सरकार ने समीक्षा के बाद इन्हें निरस्त करने का फैसला लिया। अधिकारियों के मुताबिक, जिन योजनाओं में मंदिर निधि के उपयोग को लेकर आपत्ति थी, उन्हें रोकना जरूरी समझा गया ताकि आगे किसी तरह का वित्तीय या कानूनी विवाद न खड़ा हो।
राजनीतिक बहस तेज
इस फैसले के बाद तमिलनाडु की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। एक ओर टीवीके सरकार इसे मंदिरों की संपत्ति और आय की रक्षा का कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इसे पिछली सरकार के फैसलों को पलटने की राजनीति के रूप में पेश कर सकता है।यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तमिलनाडु में मंदिर प्रशासन लंबे समय से एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा रहा है। मंदिरों की आय, उनके प्रबंधन और सरकारी नियंत्रण को लेकर पहले भी कई बार बहस होती रही है।
नीतिगत बदलाव का संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला टीवीके सरकार के उस व्यापक रुख को दिखाता है, जिसमें वह मंदिर प्रशासन और धार्मिक संस्थाओं की वित्तीय संरचना को नए तरीके से देखना चाहती है। इससे संकेत मिलता है कि आने वाले समय में मंदिरों की आय, उनके उपयोग और सरकारी नियंत्रण को लेकर और बड़े फैसले सामने आ सकते हैं।
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