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6 सांसदों के शिंदे गुट में जाने पर बोले उद्धव ठाकरे- ‘ऐसे संकट पहले भी देखे हैं, इससे मैं विचलित नहीं’

शिवसेना (यूबीटी) के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 के एकनाथ शिंदे गुट में शामिल होने के बाद उद्धव ठाकरे ने पहली प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि चुनाव में इसका जवाब दें।

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6 सांसदों के शिंदे गुट में जाने पर बोले उद्धव ठाकरे- ‘ऐसे संकट पहले भी देखे हैं, इससे मैं विचलित नहीं’

खबर के मुख्य बिंदु

  • शिवसेना (यूबीटी) के 9 में से 6 सांसद शिंदे गुट में शामिल हुए।
  • यह दलबदल 21 जून को आधिकारिक तौर पर हुआ।
  • इसके बाद लोकसभा में ठाकरे गुट के पास अब केवल 3 सांसद बचे हैं।
  • उद्धव ठाकरे ने कहा, “मैंने पहले भी ऐसे संकट देखे हैं, इससे मैं विचलित नहीं हूं।”
  • उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि इसका जवाब चुनाव में दें।
  • बागी सांसदों में ओमराजे निंबालकर, नागेश पाटिल अष्टिकर, संजय दीना पाटिल, संजय देशमुख, संजय जाधव और भाऊसाहेब वाकचौरे शामिल हैं।
  • शिंदे गुट अब संसद में “असली शिवसेना” के रूप में मान्यता पाने की कोशिश कर सकता है।
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Quick Summary

उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के लिए यह घटनाक्रम केवल संख्यात्मक नुकसान नहीं, बल्कि राजनीतिक और प्रतीकात्मक झटका भी है। लोकसभा में 9 में से 6 सांसदों का जाना ठाकरे गुट की संसदीय ताकत को काफी कमजोर करता है और यह शिंदे बनाम ठाकरे की लड़ाई को एक नए मोड़ पर ले जाता है। उद्धव ठाकरे की प्रतिक्रिया से साफ है कि वे इस दलबदल को राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा मानते हुए सार्वजनिक तौर पर कमजोर दिखना नहीं चाहते। लेकिन असली परीक्षा अब दो स्तरों पर होगी पहली, लोकसभा स्पीकर के सामने दलबदल विरोधी कानून के तहत इन सांसदों की स्थिति; और दूसरी, महाराष्ट्र की जनता और शिवसैनिकों के बीच नेतृत्व की स्वीकार्यता।

महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना को लेकर जारी खींचतान के बीच एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसद पार्टी छोड़कर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए हैं। इस बड़े राजनीतिक झटके के बाद उद्धव ठाकरे ने अपनी पहली प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने ऐसे संकट पहले भी देखे हैं और वे इससे जरा भी विचलित नहीं हुए हैं।

6 सांसदों के जाने से ठाकरे गुट को बड़ा झटका
इस दलबदल के बाद लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी) की ताकत घटकर केवल 3 सांसदों तक रह गई है। जो छह सांसद ठाकरे गुट छोड़कर शिंदे के साथ गए हैं, उनमें:
ओमप्रकाश “ओमराजे” निंबालकर (धाराशिव)
नागेश पाटिल अष्टिकर (हिंगोली)
संजय दीना पाटिल (मुंबई उत्तर-पूर्व)
संजय देशमुख (यवतमाल-वाशिम)
संजय जाधव (परभणी)
भाऊसाहेब वाकचौरे (शिरडी)
शामिल हैं।

उद्धव बोले- पहले भी ऐसे संकट देखे हैं
इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए उद्धव ठाकरे ने कहा कि यह पहली बार नहीं है जब उन्हें इस तरह के राजनीतिक संकट का सामना करना पड़ा हो। उन्होंने मीडिया से कहा:
“मैंने पहले भी ऐसे संकट का सामना किया है, इससे मैं बिल्कुल भी विचलित नहीं हुआ… आप सभी को चुनाव में इसका बदला लेना चाहिए।”
उनका यह बयान साफ तौर पर पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को संदेश देने की कोशिश माना जा रहा है कि वे अभी भी लड़ाई छोड़ने के मूड में नहीं हैं और इस झटके को चुनावी चुनौती के रूप में देख रहे हैं।

बागी सांसदों ने क्या कहा?
बताया जा रहा है कि बागी सांसदों ने अपने फैसले के पीछे राजनीतिक अस्तित्व, विकास कार्यों के लिए संसाधन और जमीनी कार्यकर्ताओं के दबाव जैसे कारण बताए हैं। धाराशिव से सांसद ओमराजे निंबालकर ने कार्यकर्ताओं के सामने अपने इस्तीफे की पुष्टि करते हुए कहा कि यह फैसला राजनीतिक परिस्थितियों और कार्यकर्ताओं की जरूरतों को देखते हुए लिया गया।

असली शिवसेना” की लड़ाई अब संसद तक
सूत्रों के मुताबिक, शिंदे गुट अब इन 6 सांसदों के साथ लोकसभा में “असली शिवसेना” के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत करने की कोशिश कर सकता है। दलबदल विरोधी कानून के तहत दो-तिहाई संख्या का सवाल इस पूरे मामले में अहम हो सकता है। अगर यह संख्या कानूनी मानदंडों के अनुरूप मानी जाती है, तो सांसदों पर तत्काल अयोग्यता का खतरा कम हो सकता है। अब इस पूरे मामले में लोकसभा स्पीकर की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। अंतिम निर्णय इस बात पर असर डालेगा कि ये सांसद अपनी सदस्यता बरकरार रख पाएंगे या नहीं।

संजय राउत ने भी किया बचाव
उद्धव ठाकरे के करीबी और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने भी इस दलबदल पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राजनीति में कई लोग आते-जाते रहे हैं, लेकिन ठाकरे परिवार राजनीति में डटा रहा है। राउत ने संकेत दिया कि यह संकट पार्टी की विचारधारा और नेतृत्व को खत्म नहीं कर सकता।

महाराष्ट्र की राजनीति में बढ़ी हलचल
शिवसेना में पहले हुए बड़े विभाजन के बाद यह नया घटनाक्रम उद्धव ठाकरे के लिए एक और बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। एक ओर शिंदे गुट अपनी संख्या और वैधता मजबूत करने की कोशिश में है, वहीं दूसरी ओर ठाकरे गुट इसे विश्वासघात और राजनीतिक दबाव की राजनीति के रूप में पेश कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यह लड़ाई केवल संसद और अदालत तक सीमित रहती है या इसका असर महाराष्ट्र की जमीनी राजनीति और आगामी चुनावों पर भी गहराई से पड़ता है।

Payal Singh

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