राजस्थान के अजमेर में NEET-UG पुनर्परीक्षा के दौरान एक मुस्लिम छात्रा को बुर्का पहनकर आने पर परीक्षा केंद्र में प्रवेश से रोके जाने का मामला सामने आया है। इस घटना ने परीक्षा केंद्रों पर ड्रेस कोड, धार्मिक स्वतंत्रता और सुरक्षा जांच के बीच संतुलन को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। छात्रा और उसके परिवार का कहना है कि NTA के नियम धार्मिक पहनावे की अनुमति देते हैं, बशर्ते सुरक्षा जांच हो जाए। वहीं, केंद्र प्रशासन की ओर से शुरुआत में कथित आपत्ति के बाद मामला बढ़ गया। आखिरकार NTA के हस्तक्षेप और स्थानीय प्रशासन की बातचीत के बाद छात्रा को परीक्षा में शामिल होने दिया गया। यह घटना एक बार फिर दिखाती है कि बड़े राष्ट्रीय परीक्षा आयोजनों में स्पष्ट दिशानिर्देशों का जमीनी स्तर पर सही पालन कितना जरूरी है।
पूरी खबर
राजस्थान के अजमेर में आयोजित NEET-UG पुनर्परीक्षा के दौरान एक बुर्का पहनी छात्रा को परीक्षा केंद्र के बाहर रोक दिए जाने से विवाद की स्थिति बन गई। छात्रा का आरोप है कि केंद्र पर मौजूद अधिकारियों ने उससे पहले दुपट्टा हटाने और फिर बुर्का उतारने को कहा, जबकि उसने दावा किया कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के नियमों के अनुसार धार्मिक पोशाक पहनकर परीक्षा देने की अनुमति है। घटना के बाद मामला बढ़ा और छात्रा के परिवार ने केंद्र प्रशासन के रवैये पर सवाल उठाए। बाद में राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) के हस्तक्षेप के बाद छात्रा को परीक्षा केंद्र में प्रवेश दिया गया और वह परीक्षा में शामिल हो सकी।
छात्रा ने क्या आरोप लगाए?
छात्रा ने बताया कि वह NEET-UG पुनर्परीक्षा देने अजमेर के एक परीक्षा केंद्र पर पहुंची थी, जहां गेट पर तैनात अधिकारियों ने उसे रोक दिया। उसके अनुसार, पहले उससे कहा गया कि वह दुपट्टा हटाए, और फिर बुर्का उतारने की बात कही गई। छात्रा ने विरोध करते हुए कहा कि उसने 3 मई को आयोजित मूल NEET-UG परीक्षा में भी यही पहनावा पहना था और तब उसे किसी प्रकार की दिक्कत नहीं हुई थी। उसका कहना था कि अगर NTA धार्मिक पहनावे की अनुमति देता है, तो केंद्र प्रशासन को उसे इस आधार पर नहीं रोकना चाहिए।
परिवार ने नियमों का हवाला दिया
छात्रा के पिता ने कहा कि NTA के नियम 18 के तहत धार्मिक परिधान पहनकर परीक्षा में शामिल होने की अनुमति है। उनका कहना था कि परिवार ने केंद्र प्रशासन से यह भी कहा कि अगर सुरक्षा जांच जरूरी है, तो एक महिला कर्मचारी को निजी स्थान पर जांच के लिए बुला लिया जाए, ताकि धार्मिक मर्यादा और सुरक्षा दोनों का पालन हो सके। पिता के मुताबिक, उन्होंने स्पष्ट तौर पर यह प्रस्ताव रखा कि पर्दे के पीछे महिला स्टाफ द्वारा जांच कर ली जाए, लेकिन शुरुआत में केंद्र कर्मियों ने इस विकल्प को स्वीकार नहीं किया। इससे विवाद और बढ़ गया।
NTA ने किया हस्तक्षेप
मामला बढ़ने के बाद राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) को स्थिति की जानकारी दी गई। NTA ने बाद में स्पष्ट किया कि धार्मिक पहनावे को लेकर नियमों के अनुसार प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए और अंततः छात्रा को परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी गई। NTA के हस्तक्षेप के बाद केंद्र प्रशासन ने छात्रा को प्रवेश दिया और वह परीक्षा में शामिल हो सकी। इससे पहले कुछ समय तक गेट पर तनाव की स्थिति बनी रही थी।
प्रशासन ने कहा नियमों की गलतफहमी थी
स्थानीय प्रशासन और पुलिस अधिकारियों के अनुसार, यह पूरा विवाद परीक्षा नियमों की स्पष्ट समझ न होने के कारण पैदा हुआ। अधिकारियों ने बताया कि जैसे ही स्थिति स्पष्ट हुई, संबंधित अधिकारियों से बात की गई और छात्रा को बिना और देरी के परीक्षा केंद्र में प्रवेश दे दिया गया। अजमेर के स्थानीय प्रशासन ने यह भी कहा कि ऐसी परिस्थितियों में परीक्षा केंद्रों को नियमों की जानकारी स्पष्ट रूप से होनी चाहिए, ताकि किसी भी छात्र को अनावश्यक परेशानी न उठानी पड़े।
बड़ा सवाल: नियम हैं, लेकिन पालन कैसे?
यह मामला सिर्फ एक छात्रा के प्रवेश विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में धार्मिक पहनावे, सुरक्षा जांच और परीक्षा प्रशासन के बीच तालमेल की चुनौती को भी सामने लाता है। NEET जैसी बड़ी परीक्षाओं में लाखों छात्र शामिल होते हैं। ऐसे में अगर ड्रेस कोड या धार्मिक परिधान को लेकर नियम हैं, तो उनकी स्पष्ट व्याख्या और केंद्र स्तर पर एकसमान पालन बेहद जरूरी हो जाता है। वरना गेट पर ही ऐसे विवाद खड़े हो सकते हैं, जो छात्रों के मानसिक तनाव को और बढ़ा देते हैं।
परीक्षा से पहले तनाव, बाद में राहत
पुनर्परीक्षा जैसे संवेदनशील माहौल में इस तरह की घटना ने छात्रा और उसके परिवार को अतिरिक्त तनाव में डाल दिया। हालांकि अंत में उसे परीक्षा में बैठने दिया गया, लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि अगर NTA के नियम पहले से मौजूद थे, तो केंद्र स्तर पर इस तरह की रोक की नौबत क्यों आई। यह घटना प्रशासन के लिए भी एक संकेत है कि राष्ट्रीय परीक्षाओं में केवल नियम बनाना काफी नहीं, बल्कि उनका प्रशिक्षण, संप्रेषण और संवेदनशील अमल भी उतना ही जरूरी है।
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