देश के कई राज्य और केंद्रीय विश्वविद्यालयों ने अब अपनी डिग्री, मार्कशीट, आधिकारिक पत्राचार, प्रमाणपत्रों और विश्वविद्यालय साइनबोर्ड पर ‘इंडिया’ शब्द की जगह ‘भारत’ शब्द का इस्तेमाल करने का निर्णय लिया है। इस बदलाव को भारत की सभ्यतागत पहचान, सांस्कृतिक जड़ों और राष्ट्रीय नामकरण की बहस से जोड़कर देखा जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस पहल को बढ़ावा देने में RSS से जुड़े संगठन शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास (SSUN) की अहम भूमिका रही है। बताया जा रहा है कि यह संगठन लंबे समय से शैक्षणिक संस्थानों में ‘भारत’ शब्द के औपचारिक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए अभियान चला रहा है।
कई राज्यों के विश्वविद्यालयों ने पारित किए प्रस्ताव
संस्थागत रिपोर्टों के मुताबिक, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात और महाराष्ट्र के 17 विश्वविद्यालयों ने इस बदलाव को लागू करने के लिए औपचारिक प्रस्ताव पारित किए हैं। इन विश्वविद्यालयों का कहना है कि वे अपने दस्तावेजों में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करना चाहते हैं जो देश की मूल पहचान को अधिक सटीक रूप से प्रतिबिंबित करें। इस बदलाव का सबसे प्रमुख उदाहरण जबलपुर स्थित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय है, जिसने घोषणा की है कि आगामी दीक्षांत समारोह में वितरित की जाने वाली सभी डिग्रियों पर हिंदी और अंग्रेजी दोनों में केवल ‘भारत’ शब्द अंकित होगा।
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय का क्या कहना है?
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलपति राजेश कुमार वर्मा ने कहा कि विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद ने यह फैसला इसलिए लिया क्योंकि “हम भारत के निवासी हैं” और संस्थान अपनी आधिकारिक पहचान में उसी नाम का उपयोग करना चाहता है जो इस भूमि की सभ्यतागत परंपरा से जुड़ा है। विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, यह सिर्फ शब्द परिवर्तन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पुनर्स्मरण का हिस्सा है, जिसमें शैक्षणिक संस्थान औपनिवेशिक दौर में प्रचलित नामों की बजाय भारतीय परंपरा में निहित नामों को प्राथमिकता देना चाहते हैं।
छत्तीसगढ़ के केंद्रीय विश्वविद्यालय ने भी लिया फैसला
इसी तरह गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़ ने भी अपने भविष्य के दस्तावेजों में ‘इंडिया’ की जगह ‘भारत’ शब्द इस्तेमाल करने का निर्णय लिया है। विश्वविद्यालय के कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल ने कहा कि “देश का असली नाम भारत है, जबकि इंडिया नाम विदेशियों द्वारा दिया गया।” हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह बदलाव तुरंत सभी मार्कशीटों में नहीं दिखेगा, लेकिन नीति-स्तर पर फैसला लिया जा चुका है और इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा।
दोहरी पहचान नहीं होनी चाहिए’: SSUN का तर्क
रिपोर्ट्स के मुताबिक, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास (SSUN) से जुड़े प्रतिनिधियों का तर्क है कि किसी राष्ट्र की दोहरी पहचान नहीं होनी चाहिए। उनका कहना है कि ‘भारत’ इस देश की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान का नाम है, जबकि ‘इंडिया’ औपनिवेशिक दौर की विरासत का हिस्सा है। उनके अनुसार, शिक्षा संस्थानों को ऐसे प्रतीकों और शब्दों को अपनाना चाहिए जो भारतीय समाज की आत्मा, इतिहास और सांस्कृतिक स्मृति के अधिक निकट हों। यही कारण है कि विश्वविद्यालयों को ‘भारत’ शब्द अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
G20 के बाद तेज हुई बहस
‘इंडिया’ बनाम ‘भारत’ की बहस को राष्ट्रीय स्तर पर उस समय और बल मिला जब G20 शिखर सम्मेलन के दौरान आधिकारिक निमंत्रणों में ‘President of Bharat’ जैसे प्रयोग सामने आए। इसके बाद विभिन्न शैक्षणिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मंचों पर इस बात पर चर्चा तेज हो गई कि आधिकारिक दस्तावेजों में देश के लिए किस नाम का इस्तेमाल होना चाहिए। अब विश्वविद्यालयों द्वारा इस दिशा में उठाए जा रहे कदम को उसी व्यापक राष्ट्रीय विमर्श का विस्तार माना जा रहा है।
चरणबद्ध तरीके से लागू होगा बदलाव
विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि यह बदलाव एक झटके में नहीं, बल्कि चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा। जहां नए दस्तावेजों, डिग्रियों और प्रमाणपत्रों में ‘भारत’ शब्द का इस्तेमाल शुरू किया जाएगा, वहीं पुरानी स्टेशनरी और छपे हुए प्रारूपों का उपयोग स्टॉक खत्म होने तक जारी रह सकता है। इस बीच, कई विश्वविद्यालयों ने यह भी संकेत दिया है कि दीक्षांत समारोह, विश्वविद्यालय के साइनबोर्ड और आधिकारिक समारोहों में भी अब ‘भारत’ शब्द को प्राथमिकता दी जाएगी।
शिक्षा से आगे बढ़कर पहचान की बहस
यह बदलाव केवल विश्वविद्यालयी कागज़ात का मामला नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय पहचान, भाषा, इतिहास और सांस्कृतिक राजनीति से जुड़ी बड़ी बहस का हिस्सा बन चुका है। समर्थकों का कहना है कि यह कदम भारत की आत्मा और सभ्यतागत स्मृति को सम्मान देने वाला है, जबकि आलोचकों के लिए यह प्रश्न भी बना रहेगा कि क्या शैक्षणिक संस्थानों का ध्यान प्रतीकात्मक बदलावों से ज्यादा अकादमिक गुणवत्ता और बुनियादी सुधारों पर होना चाहिए। फिलहाल इतना तय है कि आने वाले समय में कई विश्वविद्यालयों की डिग्रियों और मार्कशीटों पर छात्रों को ‘इंडिया’ की जगह ‘भारत’ लिखा दिखाई दे सकता है।
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