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मां ने मंगलसूत्र बेचकर खरीदा था धनुष, अब धीरज बोम्मदेवरा ने तीरंदाजी विश्व कप में जीते दो स्वर्ण पदक

अंताल्या विश्व कप में भारतीय तीरंदाज का शानदार प्रदर्शन, माता-पिता के वर्षों के संघर्ष और त्याग को समर्पित की ऐतिहासिक जीत।

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मां ने मंगलसूत्र बेचकर खरीदा था धनुष, अब धीरज बोम्मदेवरा ने तीरंदाजी विश्व कप में जीते दो स्वर्ण पदक

खबर के मुख्य बिंदु

  • धीरज बोम्मदेवरा ने तीरंदाजी विश्व कप में दो स्वर्ण पदक जीते।
  • रिकर्व मिश्रित टीम स्पर्धा में कुमकुम मोहद के साथ स्वर्ण हासिल किया।
  • व्यक्तिगत रिकर्व वर्ग में ली वू-सेओक को 7-3 से हराया।
  • यह धीरज का पहला व्यक्तिगत विश्व कप स्वर्ण पदक है।
  • आर्थिक तंगी के दौरान उनकी मां ने मंगलसूत्र और गहने बेचकर धनुष खरीदा था।
  • पुराने धनुष के लिए परिवार ने ₹56,000 जुटाए थे।
  • पिता ने बेटे के करियर के लिए तीरंदाजी के नियम सीखकर जज की भूमिका निभाई।
  • रिश्तेदारों की आलोचना के बावजूद परिवार ने पूरा समर्थन दिया।
  • अब धीरज विश्व कप के दोहरे स्वर्ण विजेता बन चुके हैं।
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Quick Summary

भारतीय तीरंदाज धीरज बोम्मदेवरा ने तुर्की के अंताल्या में आयोजित तीरंदाजी विश्व कप में दो स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। लेकिन उनकी सफलता की कहानी केवल मैदान तक सीमित नहीं है। आर्थिक कठिनाइयों के बीच उनकी मां ने अपना मंगलसूत्र बेचकर उनके लिए धनुष खरीदा था, जबकि पिता ने उनके सपने को पूरा करने के लिए अपना जीवन बदल दिया। आज धीरज की उपलब्धि उनके पूरे परिवार के संघर्ष और समर्पण की जीत बन गई है।

भारतीय तीरंदाज धीरज बोम्मदेवरा ने तुर्की के अंताल्या में आयोजित तीरंदाजी विश्व कप के तीसरे चरण में शानदार प्रदर्शन करते हुए दो स्वर्ण पदक अपने नाम किए। उन्होंने पहले कुमकुम मोहद के साथ रिकर्व मिश्रित टीम स्पर्धा का खिताब जीता और फिर व्यक्तिगत रिकर्व वर्ग में स्वर्ण पदक हासिल किया।

दक्षिण कोरिया और ली वू-सेओक को दी मात
रिकर्व मिश्रित टीम फाइनल में धीरज और कुमकुम की जोड़ी ने दक्षिण कोरिया की किम जे-डेओक और ओह येजिन की जोड़ी को 5-1 से हराया। इसके कुछ घंटों बाद धीरज ने व्यक्तिगत फाइनल में पेरिस ओलंपिक कांस्य पदक विजेता ली वू-सेओक को 7-3 से मात देकर अपना पहला व्यक्तिगत विश्व कप स्वर्ण जीता।

मां ने बेच दिए थे गहने
धीरज की सफलता के पीछे संघर्ष की लंबी कहानी छिपी है। आर्थिक तंगी के दौर में उनके परिवार के पास पेशेवर तीरंदाजी उपकरण खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे। ऐसे में उनकी मां रेवती ने अपना मंगलसूत्र और अन्य गहने बेचकर लगभग ₹56,000 जुटाए, जिससे उनके लिए एक पुराना धनुष खरीदा गया।

छोड़ना चाहते थे तीरंदाजी
जीत के बाद धीरज ने बताया कि एक समय ऐसा भी था जब आर्थिक परेशानियों के कारण उन्होंने तीरंदाजी छोड़ने का मन बना लिया था। लेकिन माता-पिता के विश्वास और त्याग ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

पिता ने भी बदली जिंदगी
धीरज के पिता श्रवण कुमार ने बेटे की प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें विजयवाड़ा की वोल्गा तीरंदाजी अकादमी में दाखिला दिलाया। बाद में उन्होंने तीरंदाजी के नियम सीखे और भारतीय तीरंदाजी संघ में जज बनकर अपने बेटे के करियर में सक्रिय भूमिका निभाई।

संघर्ष का मिला सुनहरा इनाम
रिश्तेदारों और समाज की आलोचनाओं के बावजूद परिवार ने धीरज का साथ नहीं छोड़ा। आज दो विश्व कप स्वर्ण पदकों के साथ धीरज बोम्मदेवरा भारतीय तीरंदाजी के उभरते सितारे बन चुके हैं और उनके माता-पिता का त्याग देशभर के लिए प्रेरणा बन गया है।

Payal Singh

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