सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि खड़े ऑटो-रिक्शा पर पेड़ की शाखा गिरने से हुई चोट को मोटर वाहन दुर्घटना नहीं माना जा सकता। अदालत के अनुसार, मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजा तभी दिया जा सकता है जब दुर्घटना और वाहन के उपयोग के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित हो। यह मामला Umesh Kumar से जुड़ा है। वर्ष 2007 में बेंगलुरु में भारी बारिश के दौरान वह ऑटो-रिक्शा से यात्रा कर रहे थे। बारिश तेज होने पर वाहन को सड़क किनारे एक पेड़ के नीचे रोका गया। इसी दौरान पेड़ की एक बड़ी शाखा टूटकर ऑटो पर गिर गई, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए।
दुर्घटना के बाद उनकी स्थिति बेहद गंभीर हो गई और उनके दोनों निचले अंग लकवाग्रस्त हो गए। इसके बाद उन्होंने 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग करते हुए दावा दायर किया। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) ने 2013 में इस मामले को प्राकृतिक घटना मानते हुए दावा खारिज कर दिया था। बाद में Karnataka High Court ने पीड़ित को 17.10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें Justice Sanjay Karol और Justice N. Kotiswar Singh शामिल थे, ने कहा कि ऑटो-रिक्शा केवल घटनास्थल पर मौजूद था और दुर्घटना का प्रत्यक्ष कारण वाहन नहीं था। इसलिए इसे मोटर वाहन दुर्घटना नहीं माना जा सकता। अदालत ने नगर निगमों और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्रों में पेड़ों की नियमित निगरानी और रखरखाव स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है, हालांकि हर पेड़ और शाखा की लगातार निगरानी करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
हालांकि कानूनी दृष्टि से दावा स्वीकार्य न होने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित की गंभीर शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष अधिकारों का प्रयोग किया। अदालत ने मुआवजे की राशि बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दी और संबंधित पक्षों को चार सप्ताह के भीतर ब्याज सहित भुगतान करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा कि न्याय केवल कानूनी प्रावधानों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।




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